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Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy : विपक्ष विहीन संसद लोकतंत्र के लिए हो सकती खतरनाक, क्या हो सकते है परिणाम

by Desk
January 3, 2024
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Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy : विपक्ष विहीन संसद लोकतंत्र के लिए हो सकती खतरनाक, क्या हो सकते है परिणाम

Published By Roshan Lal Saini

Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy : विपक्ष विहीन संसद का कोई लोकतांत्रिक मूल्य हो सकता है क्या? मेरे ख्याल से तो नहीं हो सकता। लेकिन ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में संसद में विपक्षी सांसद या तो होंगे ही नहीं, या अगर होंगे तो वो सरकार के ही समर्थन वाले होंगे। क्योंकि जिस प्रकार से एनडीए की वर्तमान मोदी सरकार संसद में सरकार से सवाल करने या सरकार का विरोध करने पर बर्खास्त किए जा रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एजेंडा देश की सत्ता पर एक छत्र शासन वाला एजेंडा है? मुझे हैरानी हो रही है कि विपक्षी सांसदों को बर्खास्त करने के रिकॉर्डतोड़ सिलसिले के बावजूद विपक्षी पार्टियों के नेता हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे हैं? क्या वो सरकार के आगे सरेंडर कर रहे हैं?

आज से तकरीबन 44 साल पहले साल 1973 में उस समय के विपक्ष भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेई ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने पर केंद्र की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के ख़िलाफ़ जमकर हमला किया था और वें बैलगाड़ी लेकर संसद पहुंचे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, जो कि उस समय की सबसे मजबूत प्रधानमंत्री तो थी हीं, पक्ष और विपक्ष में सबसे मजबूत नेता भी थीं, जैसे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के होते हुए कोई दूसरे चेहरे पर प्रधानमंत्री पद के लिए विचार तक नहीं कर पा रहा है, वैसे ही उस समय प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी के अलावा दूसरे चेहरे पर कोई विचार तक नहीं करता था। इसके अलावा उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके जिस प्रकार का अपना रुतबा दुनिया भर में कायम किया था। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

उससे उन्हें भारत का सबसे मजबूत प्रधानमंत्री माना गया और इसी के चलते उन्हें आयरन लेडी का खिताब मिला था। लेकिन तेल की समस्या और सरकार को राजस्व की जरूरत के बाजवूद उस पर टैक्स लगाने से विपक्ष के विरोध को इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने बर्दाश्त किया और किसी भी सांसद को न तो संसद के बाहर फिकवाया और न ही बर्खास्त किया। हालांकि इंदिरा गांधी ने भी इस मामले में अपनी हिटलरशाही कम नहीं दिखाई और दूसरी पूर्ववर्ती सरकारों ने भी सांसदों को बर्खास्त किया।

लेकिन इस कदर विपक्ष मुक्त अभियान की तरह नहीं। इंदिरा गांधी ने एक बार नौ सरकारों को बर्खास्त किया था, लेकिन एक बार अपनी ही सरकार को भी कांग्रेस की केंद्र की सरकार ने बर्खास्त करके ये भी दिखाया कि राज्य में सरकार किसी की भी हो, अगर उससे शासन नहीं संभलता है या उससे कोई असंवैधानिक भूल होती है, तो उसे माफ नहीं किया जाएगा। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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बहरहाल, पिछले दिनों शीतकालीन सत्र के दौरान वर्तमान मोदी सरकार में संसद से जिस प्रकार से सांसदों की बर्खास्तगी का सिलसिला चला, वो वाकई हैरान करने वाला था। इस सत्र के दौरान पहले दिन 14 दिसंबर को कुल 14 सांसदों को बर्खास्त किया गया। इसमें से लोकसभा के 13 और राज्यसभा का 1 सांसद बर्खास्त किया गया। इसके बाद 18 दिसंबर को 78 सांसदों को बर्खास्त किया गया, जिसमें से 45 लोकसभा और 33 राज्यसभा सांसद थे। इसके अगले दिन 19 दिसंबर को लोकसभा के 49 सांसदों को बर्खास्त कर दिया गया। इसके अगले दिन 20 दिसंबर को लोकसभा के 2 सांसदों को बर्खास्त कर दिया गया। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

इस प्रकार पिछले ढाई-तीन सालों में 20 दिसंबर तक बर्खास्त किए गए सांसदों की संख्या 143 तक पहुंच गई। इसमें पहले भी कई सांसद संसद के दोनों सदनों से मोदी सरकार में बर्खास्त हुए, जिनमें राहुल गांधी, आजम खान, शरद पवार, राघव चड्ढा, संजय सिंह जैसे नाम शामिल हैं। इनमें से दो राहुल गांधी और राघव चड्ढा को बहाली के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा और उन्हें वहां से राहत भी मिली। अभी इसी शीतकालीन संसद सत्र में कुल बर्खास्त 143 सांसदों में से 109 लोकसभा सांसद हैं और 34 राज्यसभा सांसद हैं। इनमें से ज्यादातर सांसदों को संसद की सुरक्षा में सेंध को लेकर हंगामा करने के लिए तो टीएमसी के सांसद कल्याण बनर्जी को राज्यसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ की मिमिक्री करने पर बर्खास्त किया गया। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

मेरे ख्याल से न तो विपक्ष के सवालों से सरकार को इतना नहीं डरना चाहिए। वैसे भी पूर्ण बहुमत की सरकार को किस बात का डर? रही मिमिक्री की बात, तो मैंने करीब तीन दशकों में देखा है कि संसद में खूब हंसी मजाक चलती रही है और कभी भी उसे किसी की भावनाओं को आहत करने के रूप में नहीं देखा गया। यहां तक कि पूर्ववर्ती सभी सरकारों में देखा गया कि संसद में तीखी बहस, हंगामे और हमले के बाद सभी सांसद, मंत्री  और यहां तक कि प्रधानमंत्री, सभापति और दूसरे खास लोगों को सबके साथ हंसते-बोलते, खाना खाते और केंद्रीय कक्ष में चाय पर बतियाते हुए देखा है। कई बार तो हम पत्रकारों से यही खबरें बन जाया करती थीं कि पक्ष-विपक्ष में संसद के भीतर होने वाली नोकझोंक महज एक राजनीतिक चाल है, असल में दोनों एक हैं और इस प्रकार वो फोटो छाप दिए जाते थे, जिसमें दोनों ओर के नेता एक-दूसरे के साथ हंसते-मुस्कुराते दिखते थे। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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जहां तक सवाल है जाटों और किसानों के अपमान का, तो मेरा मानना है कि जाट वही है, जो झुके नहीं, भले ही टूट जाए। वैसे भी टूटी हुई खाट और झुके हुए जाट को हमारे जाट समाज में कोई इज्जत नहीं देता, उसे मरा हुआ माना जाता है। इतिहास में चाहे वो मुगल हुकूमत की बात हो या फिर चाहे अंग्रेजी हुकूमत की बात हो, जाट कट गया है, लेकिन झुका नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से केंद्र की मोदी सरकार इसे जाट समाज की बेइज्जती बताकर जाटों की सिम्पैथी लूटना तो चाह ही रही है, देश में जातिवाद को बढ़ावा देने का षड्यंत्र भी रच रही है, वो जाट समाज को कभी बर्दाश्त नहीं हुआ। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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जाट समाज ही एक ऐसा समाज है, जो पाखंडवाद और भेदभाव से दूरी बनाकर रखता है। और अगर सरकार उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री को जाट समाज की बेइज्जती बता रही है या खुद धनखड़ इसे जाट समाज की बेइज्जती मान रहे हैं, तो जब सरकार ने एक आपराधिक मामलों में फंसे अपने सांसद को बचाने के लिए जाट समाज की इंटरनेशनल स्तर की खिलाड़ी बेटियों की सरेआम बेइज्जती इसी सरकार ने की तब उन जाटों की आत्मा कहां मर गई थी, जो अब अपनी छाती पीट रहे हैं? तब उपराष्ट्रपति ने इसे लेकर कुछ क्यों नहीं कहा? Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

रही जाट समाज के प्रति सरकार के सम्मान की तो खुद प्रधानमंत्री मोदी ने और गृहमंत्री अमित शाह ने कितनी ही बार जाट समाज से उसे आरक्षण देने का वादा किया है, लेकिन आज तक कुछ नहीं दिया। तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि अगर जाट बेल्ट में जाट नेताओं को टिकट नहीं देगी, तो उसे वहां जीत मिल ही नहीं सकती। लेकिन सवाल ये है कि जाट सांसदों या विधायकों को भाजपा में कितना महत्व दिया जाता है। केंद्र की ही बात करें, तो दो जाट समाज के मंत्री हैं, जिन्हें नाम मात्र के लिए मंत्रालयों का प्रभार दे रखा है, लेकिन एक भी काम वो अपनी मर्जी से समाज हित में करने की हैसियत नहीं रखते। न उन्हें किसी खास बैठक में शामिल किया जाता है। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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अगर उनके पास कोई किसी काम के लिए चला जाए, तो वे यही कहते हैं कि चाय पीयो, चाय अच्छी है, लेकिन काम हम नहीं कर सकते। और तो और वो एक क्लर्क तक का भी तबादला नहीं करा सकते। तो ऐसे जाट नेताओं को जाट समाज क्या करें? जाट समाज तो उन्हें अपना नेता मानता भी नहीं है। सरकार में आने के लिए इस प्रकार के झुके और बिके हुए जाटों को ये कौम अपने घर का पानी नहीं पीने देती, सम्मान देना तो दूर की बात। बहरहाल, जिस प्रकार से 13 दिसंबर को संसद पर हमले की बरसी के दिन संसद की सुरक्षा में बड़ी चूक का मामला सामने आया, उसे लेकर सवाल उठने लाजिमी थे और उठने भी चाहिए। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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सवाल यह है कि किस प्रकार से कुछ युवक दर्शक दीर्घा तक इतनी संदिग्ध और विस्फोटक सामग्री लेकर पहुंच गए? हालांकि युवाओं ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जो काम किया था और जिस उद्देश्य से किया था, वही काम इन युवाओं ने किया, जिनकी मांग रोजगार को लेकर थी। उन्होंने नारेबाजी में नहीं चलेगी तानाशाही, भारत माता की जय के नारे लगाए। बाद में इस मामले के मास्टरमाइंड माने जा रहे ललित झा समेत सात लोगों को गिरफ्तार करके उन पर संगीन धाराएं लगाकर जेल भेज दिया गया है। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

सुरक्षा में चूक के इसी मामले को लेकर विपक्ष ने गृहमंत्री अमित शाह से सदन में बयान देने के मांग की थी, लेकिन उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। सरकार ने कहा कि चूक का मामला लोकसभा सचिवालय के दायरे में आता है और उसने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। इसलिए इस मुद्दे पर विपक्ष को राजनीति नहीं करनी चाहिए। लेकिन वहीं विपक्षी सांसदों कहना है कि मोदी सरकार ने जिस प्रकार से आज लोकतंत्र का गला घोंटा है, उसके पीछे का सरकार मकसद सिर्फ और सिर्फ विपक्ष मुक्त संसद बनाना है, जिससे वो अपनी मर्जी से अपने फायदे के लिए हर बिल को बिना किसी बहस के दोनों सदनों में खुद ही पास करके उन्हें कानून बना सके। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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सांसदों की बर्खास्तगी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मोदी और गृह मंत्री अमित शाह देश भर में दौरे कर रहे हैं, लेकिन सदन में नहीं आ रहे। ये सदन की गरिमा का अपमान है। मोदी और शाह लोगों को डराकर लोकतंत्र खत्म करना चाहते हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे मोदी सरकार का बेहद अधिनायकवादी रवैया बताया। उन्होंने कहा कि सरकार को सदन चलाने का कोई नैतिक अधिकार अब नहीं रह गया है। सरकार डरी हुई है। अगर उनके पास बहुमत है, तो वो विपक्ष से क्यों डर रहे हैं? सांसदों के न रहने पर लोगों की आवाज़ कौन उठाएगा? सरकार इस तरह के कदम उठा कर जनता का गला घोंट रही है। मैं भी ममता बनर्जी के इस बयान से पूरी तरह सहमत हूं, क्योंकि विपक्ष का बने रहना ही लोकतंत्र की रक्षा के लिए हितकर है। हिंदुस्तान में तानाशाही वाली सरकार का होना देश और जनता के लिए घातक साबित होगा। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

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बहरहाल, संसद में हर मुद्दे पर बहस करना, सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का काम ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक धर्म भी है। अगर ऐसा नहीं होगा, तो सरकार निरंकुश हो जाएगी। जिस प्रकार से मोदी सरकार ने पहले ही कार्यकाल में विपक्ष को खत्म करने की चालें चलीं, तभी विपक्षी पार्टियों को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए था। मोदी सरकार ने प्रश्नकाल को भी बड़ी चालाकी से समाप्त कर दिया। संसद में भी सत्रों के दौरान जिस प्रकार से प्रधानमंत्री ज्यादातर समय गायब रहते हैं, ये भी कहां ठीक है। अगर कोई विशेष सरकारी काम से उन्हें बाहर रहना पड़े, तो ठीक भी है, लेकिन प्रधानमंत्री तो कभी प्रचार के लिए, तो कभी किसी ईवेंट के लिए अक्सर बाहर रहते हैं। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

बहरहाल, सवाल ये है कि एक सांसद कब बर्खास्त हो सकता है। कानूनी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 101 और 102 में किसी सांसद को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान है। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 102 (ई) के तहत दलबदल अधिनियम और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम भी है, जिनके तहत भी किसी सांसद को बर्खास्त करने का प्रावधान है। इन अधिनियमों में कई प्रकार के प्रावधान हैं। जैसे अगर कोई सांसद केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी गैर-कानूनी लाभ के पद पर है या दिमागी रूप से विक्षिप्त है या किसी कोर्ट द्वारा अक्षम घोषित हुआ है या सजायाफ्ता है या दिवालिया घोषित हो चुका है या फिर उसने दूसरे देश की नागरिकता हासिल कर ली है, तो उसे बर्खास्त किया जा सकता है। इसके अलावा सांसद खुद भी इस्तीफा दे सकता है। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

लेकिन वहीं संविधान के अनुच्छेद 105 के मुताबिक, संविधान के उपबंधों और संसद के नियमों के अधीन रहते हुए हर सांसद को लोकसभा या राज्यसभा में अपनी बात रखने, सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है। और मेरे ख्याल से सरकार को इसका ध्यान रखना चाहिए कि सांसद जनता के द्वारा चुना हुआ एक जन प्रतिनिधि है, जो जनता की बात भी संसद में रख सकता है और सरकार की नीतियों पर सवाल भी उठा सकता है। Parliament Without Opposition Dangerous For Democracy

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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